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जब ज़िंदगी अचानक हल्की-सी टूटने लगे, और तुम फिर भी नेटफ्लिक्स पर अटके रहो

  • Writer: NEERAJ SUTHAR
    NEERAJ SUTHAR
  • Jan 2
  • 3 min read

कभी-कभी मौत दुख नहीं देती।वो तुम्हारी सोच की रीढ़ हिला देती है।

कोई चला जाता है।ना बहुत अपना।ना दोस्त।बस कोई जाना-पहचाना चेहरा —मुलाक़ातों में दिख जाने वाला।

और फिर भी…कुछ अंदर खिसक जाता है।

ज़िंदगी अचानक भरोसेमंद नहीं लगती।पतली-सी।अस्थायी।जैसे किसी भी पल फट सकती हो।

तुम ऐसे सवाल सोचने लगते हो जिनके लिए पहले दिमाग़ में जगह ही नहीं थी:

हम इतनी बेकार चीज़ों पर क्यों उलझे रहते हैं?दूसरों की मान्यता इतनी ज़रूरी क्यों लगती है?अगर आख़िर में सबको जाना ही है, तो ये दौड़ किस लिए?

ये उदासी नहीं है।ये अवसाद नहीं है।

ये वो साफ़ समझ है जो बिना तैयारी के आ जाती है —और असहज कर देती है।


जागरूक होना ≠ चुन पाने की आज़ादी

आजकल एक बात बहुत चलती है —कि जैसे ही इंसान “aware” होता है, उसके पास choice आ जाती है।

अगर ये सच होता तोलत जैसी चीज़ें होती ही नहीं।थेरेपी की ज़रूरत नहीं पड़ती।पता होना = कर पाना होता।

लेकिन इंसान ऐसे नहीं चलता।

तुम किसी आदत को पूरी तरह समझ सकते हो —और फिर भी उसी में फँसे रह सकते हो।

तुम ज़िंदगी की नाज़ुकता देख सकते हो —और फिर भी रात को नेटफ्लिक्स चला सकते हो।

तुम समय की क़ीमत जानते हो —और फिर भी दिन निकल जाते हैं।

इसका मतलब ये नहीं कि तुम झूठे हो।इसका मतलब ये है कि तुम थके हुए हो।


हम तब भागते क्यों हैं जब ज़िंदगी भारी हो जाती है

लोग इसलिए नहीं भागते क्योंकि उन्हें ज़िंदगी की परवाह नहीं।लोग इसलिए भागते हैं क्योंकि ज़िंदगी इस समय दर्द दे रही होती है।

नेटफ्लिक्स, रील्स, पोर्न, पुराने शोज़ —ये ग़लत नहीं हैं।

ये बस राहत के साधन हैं।

जब कोशिशों से भावनात्मक फल आना बंद हो जाता है:

इंटरव्यू → कोई जवाब नहींरिश्ते → टूटनप्लान → अटकाव

तो दिमाग़ एक सवाल पूछता है:

“क्यों मेहनत करूँ?”

तब भागना आराम बन जाता है, शौक़ नहीं।

समस्या भागने में नहीं है।समस्या तब है जब सुकून सिर्फ़ वहीं मिले।


वो चक्र जिसे सब जीते हैं, पर कोई मानता नहीं

सच का चक्र कुछ ऐसा है:

कोशिश → नकार → झुँझलाहटझुँझलाहट → भागनाभागना → थोड़ी राहतराहत → ऊर्जा कमऊर्जा कम → टालनाटालना → और झुँझलाहट

ये अनुशासन से नहीं टूटता।ये तब टूटता है जब ऊर्जा और अपने ऊपर भरोसा लौटता है।


मोटिवेशन यहाँ क्यों काम नहीं करता

खुद से ये कहना:

“ज़िंदगी छोटी है”“सब मरने वाले हैं”“मुझे बेहतर करना चाहिए”

ये मदद नहीं करता।ये दबाव बनाता है।

दबाव → अपराधबोधअपराधबोध → पलायनथकान → मोटिवेशन खत्म

अगर समझ ही सब ठीक कर देती,तो किसी की ज़िंदगी उलझी न होती।


चुनाव कोई स्विच नहीं है

चुनाव की ताक़त बदलती रहती है।

जब ज़िंदगी स्थिर हो — चुनाव ज़्यादाजब ज़िंदगी अनिश्चित हो — चुनाव कमजब ज़िंदगी भारी हो — चुनाव लगभग नहीं

ऐसे समय में दिमाग़ ये नहीं पूछता“क्या meaningful है?”

वो पूछता है:“आज कैसे निकालूँ बिना टूटे?”

नेटफ्लिक्स उसका आसान जवाब है।

ये कमजोरी नहीं है।ये इंसान होना है।


जब करियर हिल रहा हो, तब अर्थ कहाँ से आए?

इस समय अर्थ नतीजों से नहीं आ सकता।वो दिन जीने के ढंग से आता है।

एक meaningful दिन का मतलब जीत नहीं होता।मतलब होता है — खुद से रिश्ता टूटा नहीं।

न्यूनतम meaningful दिन के तीन स्तंभ:

1. देखभालनहाना।साफ़ कपड़े।सीधा-सा खाना।बस इतना कि शरीर उपेक्षित न लगे।

2. अभिव्यक्तिसुधार नहीं — बस बाहर निकालना।लिखना।बोलना।अपने विचारों को जगह देना।

3. छोटी-सी पहलआज कुछ ऐसा जो कल नहीं था।बहुत छोटा।आसान रहते ही रोक देना।

यही भरोसा लौटाता है।


आदतें दबाव से नहीं लौटतीं

आदतें वहीं से बनती हैं जहाँ पहले से कुछ चल रहा हो।

अगर तुम रोज़ कुछ कर पा रहे हो —तो यही सबूत है।

नई आदतें छोटी हों।पुरानी से जुड़ी हों।और ज़बरदस्ती से पहले रुक जाएँ।

पढ़ना किताब ख़त्म करने से नहीं लौटता।बीच में बंद करने से लौटता है।


रात खुद को सुधारने का समय नहीं

रात में ऊर्जा कम होती है।संयम कम होता है।आत्म-आलोचना तेज़ होती है।

रात को “ज़िंदगी ठीक करने” की कोशिशअपने साथ सख़्ती है।

रात सिर्फ़ तीन चीज़ों के लिए है: जो बचा है, निकालो।दिमाग़ बंद करो।सोने दो।


फोन से लड़ने की ज़रूरत नहीं

फोन दुश्मन नहीं है।वो थकान से नींद तक का पुल है।

लक्ष्य फोन हटाना नहीं है।लक्ष्य उत्तेजना कम करना है।

लंबा कंटेंट शांत करता है।अनंत स्क्रॉल बेचैन करता है।

आदतें धीरे-धीरे छूटती हैं।ज़ोर से नहीं।


शादी, भरोसा और अभी तय न करना

अभी शादी न चाहना असफलता नहीं।ये ईमानदारी है।

अगर तुम सच में समझदार साथी चाहते हो,तो रास्ता लंबा होगा।खामोश होगा।

और ये ठीक है।

ज़िंदगी अस्थिर हो तो फैसले टालना समझदारी है।भूखे होकर बाज़ार मत जाओ।


आख़िरी बात

तुम ज़िंदगी बर्बाद नहीं कर रहे।

तुम बसऊर्जा बचा रहे हो।खुद को टूटने से रोक रहे हो।खोखले जवाबों से बच रहे हो।

कभी-कभी अर्थ आगे बढ़ने में नहीं होता।कभी-कभी वो बस गायब न होने में होता है।

और वो भी काफ़ी है।


याद रखने लायक़ एक पंक्ति

“जब चीज़ें साफ़ न हों, तब धीरे जीने की इजाज़त मुझे है।”

यही इजाज़तसबसे ज़्यादा चक्र तोड़ती है।

 
 
 

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